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title: "लंकाकाण्ड दोहा 87"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 87

**चौ०** 
> एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी॥  
> देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा॥ १ ॥

भावार्थ: इसी बीचमें निशाचरोंकी अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई ( आपसमें टकराती हुई ) आयी। उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार [ उसके ] सामने चले जैसे प्रलयकालके बादलोंके समूह हों॥१॥

**चौ०** 
> बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं॥  
> गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा॥२॥

भावार्थ: बहुत-से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं। मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ चमक रही हों। हाथी, रथ और घोड़ोंका कठोर चिग्घाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों॥२॥

**चौ०** 
> कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥  
> उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥३॥

भावार्थ: वानरोंकी बहुत-सी पूँछें आकाशमें छायी हुई हैं। [ वे ऐसी शोभा दे रही हैं ] मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों। धूल ऐसी उठ रही है मानो जलकी धारा हो। बाणरूपी बूँदोंकी अपार वृष्टि हुई॥३॥

**चौ०** 
> दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥  
> रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥४॥

भावार्थ: दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंका प्रहार करते हैं। मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके बाणोंकी झड़ी लगा दी, [ जिससे ] राक्षसोंकी सेना घायल हो गयी॥४॥

**चौ०** 
> लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं॥  
> स्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी॥५॥

भावार्थ: बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। उनके शरीरोंसे ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वतके भारी झरनोंसे जल बह रहा हो। इस प्रकार डरपोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली रुधिरकी नदी बह चली॥५॥

**छं०** 
> कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।  
> दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी॥  
> जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।  
> सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥

भावार्थ: डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुवे हैं।

**दो०** 
> बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।  
> कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन॥८७॥

भावार्थ: वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है॥८७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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