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title: "लंकाकाण्ड दोहा 86"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 86

**चौ०** 
> चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥  
> भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥१॥

भावार्थ: चलते समय अत्यन्त भयङ्कर अमङ्गल ( अपशकुन ) होने लगे। गीध उड़-उड़कर उसके सिरोंपर बैठने लगे। किन्तु वह कालके वश था, इससे किसी भी अपशकुनको नहीं मानता था। उसने कहा—युद्धका डंका बजाओ॥१॥

**चौ०** 
> चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा॥  
> प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें। सलभ समूह अनल कहँ जैसें॥२॥

भावार्थ: निशाचरोंकी अपार सेना चली। उसमें बहुत-से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं। वे दुष्ट प्रभुके सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगोंके समूह अग्निकी ओर [ जलनेके लिये ] दौड़ते हैं॥२॥

**चौ०** 
> इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥  
> अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥३॥

भावार्थ: इधर देवताओंने स्तुति की कि हे श्रीरामजी! इसने हमको दारुण दुःख दिये हैं। अब आप इसे [ अधिक ] न खेलाइये। जानकीजी बहुत ही दुःखी हो रही हैं॥३॥

**चौ०** 
> देव बचन सुनि प्रभु मुसुकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना॥  
> जटा जूट दृढ़ बाँधें माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे॥४॥

भावार्थ: देवताओंके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर श्रीरघुवीरने उठकर बाण सुधारे। मस्तकपर जटाओंके जूड़ेको कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच-बीचमें पुष्प गूँथे हुए शोभित हो रहे हैं॥४॥

**चौ०** 
> अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा॥  
> कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा॥५॥

भावार्थ: लाल नेत्र और मेघके समान श्याम शरीरवाले और सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं। प्रभुने कमरमें फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथमें कठोर शार्ङ्गधनुष ले लिया॥५॥

**छं०** 
> सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।  
> भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥  
> कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।  
> ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥

भावार्थ: प्रभुने हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर कमरमें बाणोंकी खान ( अक्षय ) सुन्दर तरकस कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं और मनोहर चौड़ी छातीपर ब्राह्मण ( भृगुजी ) के चरणका चिह्न शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथमें लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओंके हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे।

**दो०** 
> सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।  
> जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥८६॥

भावार्थ: [ भगवान्‌की ] शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणोंके धाम करुणानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो [ ऐसा पुकारने लगे ]॥८६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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