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title: "लंकाकाण्ड दोहा 84"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 84

**चौ०** 
> जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥  
> मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥१॥

भावार्थ: हनुमान्‌जी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं। और फिर क्रोधसे भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमान्‌जीने रावणको एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो॥१॥

**चौ०** 
> मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥  
> धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही॥२॥

भावार्थ: मूर्च्छा भंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमान्‌जीके बड़े भारी बलको सराहने लगा। [ हनुमान्‌जीने कहा— ] मेरे पौरुषको धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है,जो हे देवद्रोही! तू अब भी जीता रह गया॥२॥

**चौ०** 
> अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥  
> कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥३॥

भावार्थ: ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमान्‌जी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये। यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीरने [ लक्ष्मणजीसे ] कहा—हे भाई! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो॥३॥

**चौ०** 
> सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥  
> पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥४॥

भावार्थ: ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे। वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे॥४॥

**छं०** 
> आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो।  
> गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥  
> सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो।  
> रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥

भावार्थ: फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूरकर और सारथिको मारकर उसे ( रावणको ) व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत ही लंकाको ले गया। प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया।

**दो०** 
> उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।  
> राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥८४॥

भावार्थ: वहाँ ( लंकामें ) रावण मूर्च्छासे जागकर कुछ यज्ञ करने लगा। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है॥८४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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