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title: "लंकाकाण्ड दोहा 83"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 83

रावण-मूर्च्छा,रावण-यज्ञ-विध्वंस,राम-रावण-युद्ध

**चौ०** 
> रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥  
> खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥१॥

भावार्थ: [ लक्ष्मणजीने पास जाकर कहा— ] अरे दुष्ट! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है ? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ। [ रावणने कहा— ] अरे मेरे पुत्रके घातक! मैं तुझीको ढूँढ़ रहा था। आज तुझे मारकर [ अपनी ] छाती ठंडी करूँगा॥१॥

**चौ०** 
> अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा॥  
> कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे॥२॥

भावार्थ: ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड बाण छोड़े। लक्ष्मणजीने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये। लक्ष्मणजीने उनको तिलके बराबर करके काटकर हटा दिया॥२॥

**चौ०** 
> पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा॥  
> सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला॥३॥

भावार्थ: फिर अपने बाणोंसे [ उसपर ] प्रहार किया और [ उसके ] रथको तोड़कर सारथिको मार डाला। [ रावणके ] दसों मस्तकोंमें सौ-सौ बाण मारे। वे सिरोंमें ऐसे पैठ गये मानो पहाड़के शिखरोंमें सर्प प्रवेश कर रहे हों॥३॥

**चौ०** 
> पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥  
> उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥४॥

भावार्थ: फिर सौ बाण उसकी छातीमें मारे। वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटनेपर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी॥४॥

**छं०** 
> सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।  
> पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥  
> ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।  
> तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥

भावार्थ: वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीकी ठीक छातीमें लगी। वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े। तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी ( व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका )। जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माण्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनोंके स्वामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता।

**दो०** 
> देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।  
> आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥८३॥

भावार्थ: यह देखकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमान्‌जीके आते ही रावण उनपर अत्यन्त भयङ्कर घूँसेका प्रहार किया॥८३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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