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title: "लंकाकाण्ड दोहा 80c"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 80c

**चौ०** 
> रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥  
> अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥१॥

भावार्थ: रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें सन्देह हो गया [ कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे ]। श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे॥१॥

**चौ०** 
> नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥  
> सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥२॥

भावार्थ: हे नाथ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा ? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा—हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है॥२॥

**चौ०** 
> सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥  
> बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥३॥

भावार्थ: शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं। सत्य और शील ( सदाचार ) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम ( इन्द्रियोंका वशमें होना ) और परोपकार—ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं॥३॥

**चौ०** 
> ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥  
> दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥४॥

भावार्थ: ईश्वरका भजन ही [ उस रथको चलानेवाला ] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥४॥

**चौ०** 
> अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥  
> कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥५॥

भावार्थ: निर्मल ( पापरहित ) और अचल ( स्थिर ) मन तरकसके समान है। शम ( मनका वशमें होना ), [ अहिंसादि ] यम और [ शौचादि ] नियम—ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है॥५॥

**चौ०** 
> सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥६॥

भावार्थ: हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है॥६॥

**दो०** 
> महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।  
> जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥८० (क)॥

भावार्थ: हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार ( जन्म-मृत्यु )-रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [ रावणकी तो बात ही क्या है ]॥८० ( क )॥

**दो०** 
> सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।  
> एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥८० (ख)॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [ और कहा— ] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [ महान् ] उपदेश दिया॥८० ( ख )॥

**दो०** 
> उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।  
> लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥८० (ग)॥

भावार्थ: उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद और हनुमान्। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं॥८० ( ग )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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