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title: "लंकाकाण्ड दोहा 76"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 76

**चौ०** 
> जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥  
> कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥१॥

भावार्थ: वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसेकी आहुति दे रहा है। वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे॥१॥

**चौ०** 
> तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥  
> लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥२॥

भावार्थ: इतनेपर भी वह न उठा, [ तब ] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातोंसे मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे॥२॥

**चौ०** 
> आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥  
> कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥३॥

भावार्थ: वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति ( हनुमान्‌ ) और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया॥३॥

**चौ०** 
> प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥  
> उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥४॥

भावार्थ: फिर उसने प्रभु श्रीलक्ष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा। अनन्त ( श्रीलक्ष्मणजी ) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमान्‌जी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी॥४॥

**चौ०** 
> फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥  
> आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥५॥

भावार्थ: शत्रु ( मेघनाद ) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े॥५॥

**चौ०** 
> देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥  
> बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥६॥

भावार्थ: वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति-भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था॥६॥

**चौ०** 
> देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥  
> लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥७॥

भावार्थ: शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी ( लक्ष्मणजी ) बहुत ही क्रोधित हुए। लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [ अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये। ]॥७॥

**चौ०** 
> सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥  
> छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥८॥

भावार्थ: कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्प करके बाणका सन्धान किया। बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीचमें लगा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया॥८॥

**दो०** 
> रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।  
> धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥७६॥

भावार्थ: रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान्‌ कहने लगे—तेरी माता धन्य है, धन्य है, [ जो तू लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके नामोंका उच्चारण किया। ]॥७६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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