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title: "लंकाकाण्ड दोहा 75"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 75

मेघनाद-यज्ञ-विध्वंस, युद्ध और मेघनाद-उद्धार

**चौ०** 
> मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥  
> तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥१॥

भावार्थ: मेघनादकी मूर्च्छा छूटी, [ तब ] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय ( अजेय होनेको ) यज्ञ करूँ, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया॥१॥

**चौ०** 
> इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥  
> मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥२॥

भावार्थ: यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [ और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ] हे अतुलनीय बलवान्‌ उदार प्रभो! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है॥२॥

**चौ०** 
> जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥  
> सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥३॥

भावार्थ: हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [ और कहा— ]॥३॥

**चौ०** 
> लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥  
> तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥४॥

भावार्थ: हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है॥४॥

**चौ०** 
> मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥  
> जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥५॥

भावार्थ: हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो। हे जाम्बवान्‌, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [ इनके ] साथ रहना॥५॥

**चौ०** 
> जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥  
> प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥६॥

भावार्थ: [ इस प्रकार ] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर ( चढ़ाकर ) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले— ॥६॥

**चौ०** 
> जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥  
> जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥७॥

भावार्थ: यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा॥७॥

**दो०** 
> रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।  
> अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥७५॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान्‌ आदि उत्तम योद्धा थे॥७५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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