---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 71"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-71"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 71

मेघनादका युद्ध, रामजीका लीलासे नागपाशमें बँधना

**चौ०** 
> सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो॥  
> बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥१॥

भावार्थ: करुणानिधान भगवान्‌ने देवताओंको भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुषको कानतक तानकर राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा॥ १ ॥

**चौ०** 
> सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥  
> तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥२॥

भावार्थ: मुखमें बाण भरे हुए वह [ प्रभुके ] सामने दौड़ा। मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया॥ २ ॥

**चौ०** 
> सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥  
> धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥३॥

भावार्थ: वह सिर रावणके आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प। कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥  
> तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥४॥

भावार्थ: वानर-भालू और निशाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया। [ यह देखकर ] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना॥ ४ ॥

**चौ०** 
> सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥  
> करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥५॥

भावार्थ: देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गये। उसी समय देवर्षि नारद आये॥ ५ ॥

**चौ०** 
> गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥  
> बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥६॥

भावार्थ: आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये। [ उस समय ] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [ अत्यन्त ] सुशोभित हुए॥ ६ ॥

**छं०** 
> संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।  
> श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥  
> भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।  
> कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥

भावार्थ: अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं। मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से ( हजार ) मुख हैं।

**दो०** 
> निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।  
> गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥७१॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अतः वे मनुष्य [ निश्चय ही ] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते॥ ७१ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-70  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-72

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
