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title: "लंकाकाण्ड दोहा 70"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 70

**चौ०** 
> भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा॥  
> चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥१॥

भावार्थ: यह देखकर रीछ-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़ियेको देखकर भेड़ोंके झुंड। [ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले॥ १ ॥

**चौ०** 
> यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥  
> कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥२॥

भावार्थ: [ वे कहने लगे— ] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!॥ २ ॥

**चौ०** 
> सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥  
> राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥३॥

भावार्थ: करुणाभरे वचन सुनते ही भगवान्‌ धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्रीरामजीने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [ अकेले ] क्रोधपूर्वक चले ( आगे बढ़े )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥  
> लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥४॥

भावार्थ: उन्होंने धनुषको खींचकर सौ बाण सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीरमें समा गये। बाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा। उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी॥ ४ ॥

**चौ०** 
> लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी॥  
> धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥५॥

भावार्थ: उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा। प्रभुने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वीपर गिरा दी॥ ५ ॥

**चौ०** 
> काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥  
> उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका॥६॥

भावार्थ: भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा। मानो तीनों लोकोंको निगल जाना चाहता हो॥ ६ ॥

**दो०** 
> करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।  
> गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥७०॥

भावार्थ: वह बड़े जोरसे चिग्घाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे॥ ७० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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