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title: "लंकाकाण्ड दोहा 68"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 68

**चौ०** 
> कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥  
> प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥१॥

भावार्थ: हाथमें शार्ङ्गधनुष और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले। प्रभुने पहले तो धनुषका टंकार किया जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रुदल बहरा हो गया॥ १ ॥

**चौ०** 
> सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥  
> जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥२॥

भावार्थ: फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल-सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत-से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥  
> घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥३॥

भावार्थ: उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से वीरोंके सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥  
> रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥४॥

भावार्थ: बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड ( सिर ) के प्रचण्ड रुण्ड ( धड़ ) दौड़ रहे हैं और ‘पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो’ का शब्द करते हुए गा ( चिल्ला ) रहे हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।  
> पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥६८॥

भावार्थ: प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोंको काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये॥ ६८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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