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title: "लंकाकाण्ड दोहा 65"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 65

**चौ०** 
> बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥  
> नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥१॥

भावार्थ: भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे। [ विभीषणने कहा— ] हे नाथ! पर्वतके समान [ विशाल ] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है॥१॥

**चौ०** 
> एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥  
> लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥ २॥

भावार्थ: वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर ( हर्षध्वनि करके ) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [ उखाड़कर ] उठा लिये और [ क्रोधसे ] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे॥२॥

**चौ०** 
> कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥  
> मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥३॥

भावार्थ: रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा ( विचलित हुआ ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता!॥३॥

**चौ०** 
> तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर्यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥  
> पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥४॥

भावार्थ: तब हनुमान्‌जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्‌जीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥४॥

**चौ०** 
> पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥  
> चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥५॥

भावार्थ: फिर उसने नल-नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली। सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता॥५॥

**दो०** 
> अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।  
> काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥६५॥

भावार्थ: सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला॥६५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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