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title: "लंकाकाण्ड दोहा 63"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 63

**चौ०** 
> भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥  
> अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥१॥

भावार्थ: हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्या जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा॥१॥

**चौ०** 
> हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥  
> अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥२॥

भावार्थ: हे रावण! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥२॥

**चौ०** 
> कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥  
> नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा॥३॥

भावार्थ: हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा॥३॥

**चौ०** 
> अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥  
> स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥४॥

भावार्थ: हे भाई! अब तो [ अन्तिम बार ] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ॥४॥

**दो०** 
> राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।  
> रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥६३॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये॥६३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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