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title: "लंकाकाण्ड दोहा 60b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 60b

**चौ०** 
> तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥  
> कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥१॥

भावार्थ: [ भरतजी बोले— ] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर ( हनुमान्‌जी ) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुःखी हुए और मनमें पछताने लगे॥१॥

**चौ०** 
> अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥  
> जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥२॥

भावार्थ: हा दैव! मैं जगत्‌में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर ( विपरीत समय ) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्‌जीसे बोले— ॥२॥

**चौ०** 
> तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥  
> चढ़ु मम सायक सैल समेता । पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता ॥३॥

भावार्थ: हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [ अतः ] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं॥३॥

**चौ०** 
> सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥  
> राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥४॥

भावार्थ: भरतजीकी यह बात सुनकर [ एक बार तो ] हनुमान्‌जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [ किन्तु ] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥४॥

**दो०** 
> तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।  
> अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥६० (क)॥

भावार्थ: हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्‌जी चले॥६० ( क )॥

**दो०** 
> भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।  
> मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥६० (ख)॥

भावार्थ: भरतजीके बाहुबल, शील ( सुन्दर स्वभाव ), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्‌जी चले जा रहे हैं॥६० ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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