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title: "लंकाकाण्ड दोहा 6"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 6

**चौ०** 
> निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी॥  
> मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥१॥

भावार्थ: फिर अपनी व्याकुलताको समझकर[ ऊपरसे ] हँसता हुआ, भयको भुलाकर रावण महलको गया।[ जब ] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बँधवा लिया है,॥ १ ॥

**चौ०** 
> कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥  
> चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥२॥

भावार्थ: [ तब ] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली। चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा—हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये॥ २ ॥

**चौ०** 
> नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥  
> तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥३॥

भावार्थ: हे नाथ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके। आपमें और श्रीरघुनाथजीमें निश्चय ही कैसा अन्तर है, जैसा जुगनू और सूर्यमें!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे॥  
> जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा॥४॥

भावार्थ: जिन्होंने [ विष्णुरूपसे ] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [ दैत्य ] मारे और [ वाराह और नृसिंहरूपसे ] महान् शूरवीर दितिके पुत्रों ( हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ) का संहार किया; जिन्होंने [ वामनरूपसे ] बलिको बाँधा और [ परशुरामरूपसे ] सहस्रबाहुको मारा, वे ही [ भगवान्‌ ] पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये [ रामरूपमें ] अवतीर्ण ( प्रकट ) हुए हैं!॥ ४ ॥

**चौ०** 
> तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा॥५॥

भावार्थ: हे नाथ! उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और जीव सभी हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> रामहि सौंपि जानकी नाइ कमल पद माथ।  
> सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥६॥

भावार्थ: [ श्रीरामजीके ] चरणकमलोंमें सिर नवाकर ( उनकी शरणमें जाकर ) उनको जानकीजी सौंप दीजिये और आप पुत्रको राज्य देकर वनमें जाकर श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये॥ ६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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