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title: "लंकाकाण्ड दोहा 59"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 59

श्रीरामजीकी प्रलापलीला, हनुमान्‌जीका लौटना, लक्ष्मणजीका उठ बैठना

**चौ०** 
> परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥  
> सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥१॥

भावार्थ: बाण लगते ही हनुमान्‌जी ‘राम, राम, रघुपति’ का उच्चारण करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन ( रामनाम ) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्‌जीके पास आये॥१॥

**चौ०** 
> बिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥  
> मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत बचन भरि लोचन बारी ॥२॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया। बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुःखी हुए और नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका ] जल भरकर ये वचन बोले— ॥२॥

**चौ०** 
> जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥  
> जौं मोरें मन बच अरु काया । प्रीति राम पद कमल अमाया ॥३॥

भावार्थ: जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥३॥

**चौ०** 
> तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥  
> सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥४॥

भावार्थ: और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्‌जी ‘कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो’ कहते हुए उठ बैठे॥४॥

**सो०** 
> लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।  
> प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥५९॥

भावार्थ: भरतजीने वानर ( हनुमान्‌जी )को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका ] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी॥५९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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