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title: "लंकाकाण्ड दोहा 58"
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lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 58

**चौ०** 
> कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥  
> मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥१॥

भावार्थ: [ उसने कहा— ] हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी। हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो॥१॥

**चौ०** 
> अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥  
> कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू ॥२॥

भावार्थ: ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्‌जी निशाचरके पास गये। हनुमान्‌जीने कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा॥२॥

**चौ०** 
> सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥  
> राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥३॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह ( उसके मुँहसे राम-नामका उच्चारण ) सुनकर हनुमान्‌जी मनमें हर्षित होकर चले॥३॥

**चौ०** 
> देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥  
> गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥ ४ ॥

भावार्थ: उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमान्‌जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्‌जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये॥४॥

**दो०** 
> देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि ।  
> बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥५८॥

भावार्थ: भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा॥५८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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