---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 57"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-57"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 57

भरतजीके बाणसे हनुमान्‌का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान्-संवाद

**चौ०** 
> अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥  
> मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥१॥

भावार्थ: वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्‌जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय॥१॥

**चौ०** 
> राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥  
> जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥२॥

भावार्थ: राक्षस वहाँ कपट [ से मुनि ]का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा॥२॥

**चौ०** 
> होत महा रन रावन रामहिं । जितिहहिं राम न संसय या महिं ॥  
> इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥३॥

भावार्थ: [ वह बोला— ] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है॥३॥

**चौ०** 
> मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥  
> सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥४॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्‌जीने कहा—थोड़े जलसे मैं तृप्त नहीं होनेका। तब वह बोला—तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो॥४॥

**दो०** 
> सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।  
> मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥५७॥

भावार्थ: तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरीने अकुलाकर उसी समय हनुमान्‌जीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्‌जीने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली॥५७॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-56  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-58

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
