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title: "लंकाकाण्ड दोहा 55"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 55

हनुमान्‌जीका सुषेण वैद्यको लाना एवं संजीवनीके लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार

**चौ०** 
> सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥  
> सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥१॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! सुनो, [ प्रलयकालमें ] जिन ( शेषनाग )-के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [ जीव ] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है?॥१॥

**चौ०** 
> यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥  
> संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥२॥

भावार्थ: इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे॥२॥

**चौ०** 
> ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥  
> तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥३॥

भावार्थ: व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—लक्ष्मण कहाँ हैं? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाईको [ इस दशामें ] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना॥३॥

**चौ०** 
> जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥  
> धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥४॥

भावार्थ: जाम्बवान्‌ने कहा—लङ्कामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय? हनुमान्‌जी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये॥४॥

**दो०** 
> राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।  
> कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥५५॥

भावार्थ: सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, ( और कहा कि ) हे पवनपुत्र! ओषधि लेने जाओ॥५५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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