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title: "लंकाकाण्ड दोहा 54"
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lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 54

**चौ०** 
> घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे॥  
> लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥१॥

भावार्थ: घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक-दूसरेसे भिड़ते हैं॥१॥

**चौ०** 
> एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥  
> क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥२॥

भावार्थ: एक-दूसरेको ( कोई किसीको ) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल ( माया ) और अनीति ( अधर्म ) करता है, तब भगवान् अनन्तजी ( लक्ष्मणजी ) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथको तोड़ डाला और सारथिको टुकड़े-टुकड़े कर दिये!॥२॥

**चौ०** 
> नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥  
> रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥३॥

भावार्थ: शेषजी ( लक्ष्मणजी ) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे। राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये। रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अब तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे॥३॥

**चौ०** 
> बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥  
> मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥४॥

भावार्थ: तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी। शक्तिके लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥४॥

**दो०** 
> मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।  
> जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥५४॥

भावार्थ: मेघनादके समान सौ करोड़ ( अगणित ) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परन्तु जगत्‌के आधार श्रीशेषजी ( लक्ष्मणजी ) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गये॥५४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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