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title: "लंकाकाण्ड दोहा 52"
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lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 52

**चौ०** 
> नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥  
> नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥१॥

भावार्थ: आकाशमें [ ऊँचे ] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वीसे जलकी धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकारके पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर ‘मारो, काटो’ की आवाज करने लगीं॥१॥

**चौ०** 
> बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥  
> बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥२॥

भावार्थ: वह कभी तो विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता था और कभी बहुत-से पत्थर फेंके देता था। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था॥२॥

**चौ०** 
> कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें॥  
> कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥३॥

भावार्थ: माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे ( इसी तरह रहा ) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं॥३॥

**चौ०** 
> एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥  
> कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥४॥

भावार्थ: तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [ जिससे ] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे॥४॥

**दो०** 
> आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।  
> लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥५२॥

भावार्थ: श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी क्रुद्ध होकर चले॥५२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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