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title: "लंकाकाण्ड दोहा 49"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 49

**चौ०** 
> परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥  
> ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे॥१॥

भावार्थ: [ अतः ] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो। रावणको उसके वचन बाणके समान लगे। [ वह बोला— ] अरे अभागे ! मुँह काला करके [ यहाँसे ] निकल जा॥ १॥

**चौ०** 
> बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥  
> तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥२॥

भावार्थ: तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला। रावणके ये वचन सुनकर उसने ( माल्यवान्‌ने ) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं॥ २॥

**चौ०** 
> सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥  
> कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥३॥

भावार्थ: वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला—सबेरे मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ ? ( जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा )॥ ३॥

**चौ०** 
> सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥  
> करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥४॥

भावार्थ: पुत्रके वचन सुनकर रावणको भरोसा आ गया। उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे॥ ४॥

**चौ०** 
> कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥  
> बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥५॥

भावार्थ: वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया। नगरमें बहुत ही कोलाहल ( शोर ) मच गया। राक्षस बहुत तरहके अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ोंके शिखर ढहाये॥ ५॥

**छं०** 
> ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।  
> घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥  
> मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।  
> गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥

भावार्थ: उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो ( बिजली गिरी हो ) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं ( घायल हो जाते हैं ), उनके शरीर जर्जर ( चलनी ) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं ( हिम्मत नहीं हारते )। वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ ( जो जहाँ होते हैं वहीं ) मारे जाते हैं।

**दो०** 
> मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ।  
> उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥ ४९ ॥

भावार्थ: मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोंने आकर फिर किलेको घेर लिया है। तब वह वीर किलेसे उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला॥ ४९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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