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title: "लंकाकाण्ड दोहा 48b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 48b

**चौ०** 
> निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥  
> राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥१॥

भावार्थ: रात हुई जानकर वानरोंकी चारों सेनाएँ ( टुकड़ियाँ ) वहाँ आयीं जहाँ कोसलपति श्रीरामजी थे। श्रीरामजीने ज्यों ही सबको कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गये॥ १॥

**चौ०** 
> उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥  
> आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥२॥

भावार्थ: वहाँ [ लङ्कामें ] रावणने मन्त्रियोंको बुलाया और जो योद्धा मारे गये थे उन सबको सबसे बताया। [ उसने कहा— ] वानरोंने आधी सेनाका संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार ( उपाय ) करना चाहिये?॥ २॥

**चौ०** 
> माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥  
> बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥३॥

भावार्थ: माल्यवंत [ नामका एक ] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावणकी माताका पिता ( अर्थात्‌ उसका नाना ) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला—हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो—॥ ३॥

**चौ०** 
> जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥  
> बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥४॥

भावार्थ: जबसे तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते। वेद-पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया॥ ४॥

**दो०** 
> हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।  
> जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥४८ (क)॥

भावार्थ: भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान्‌ मधु-कैटभको जिन्होंने मारा था, वे ही कृपाके समुद्र भगवान्‌ [ रामरूपसे ] अवतरित हुए हैं॥ ४८ ( क )॥

**दो०** 
> कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।  
> सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥४८ (ख)॥

भावार्थ: जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके समूहरूपी वनके भस्म करनेवाले [ अग्नि ] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा?॥ ४८ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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