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title: "लंकाकाण्ड दोहा 45"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 45

**चौ०** 
> महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥  
> कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥१॥

भावार्थ: जिन बड़े-बड़े मुखियों ( प्रधान सेनापतियों )-को पकड़ पाते हैं उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम ( परम पद ) दे देते हैं॥ १॥

**चौ०** 
> खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी॥  
> उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥२॥

भावार्थ: ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [ परन्तु सहजमें नहीं पाते ]। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा ! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहृदय और करुणाकी खान हैं। [ वे सोचते हैं कि ] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं॥ २॥

**चौ०** 
> देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥  
> अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥३॥

भावार्थ: ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति ( मोक्ष ) देते हैं। हे भवानी ! कहो तो ऐसे कृपालु [ और ] कौन हैं ? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥  
> लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीने कहा कि अङ्गद और हनुमान्‌ किलेमें घुस गये हैं। दोनों वानर लङ्कामें [ विध्वंस करते ] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों॥ ४॥

**दो०** 
> भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।  
> कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥४५॥

भावार्थ: भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान्‌ और अङ्गद दोनों कूद पड़े और श्रम ( थकावट ) रहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान्‌ श्रीरामजी थे॥ ४५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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