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title: "लंकाकाण्ड दोहा 42"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 42

**चौ०** 
> राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥  
> चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥१॥

भावार्थ: श्रीरामजीके प्रतापसे प्रबल वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूह-के-समूह योद्धाओंको मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किलेपर चढ़ गये और प्रतापमें सूर्यके समान श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे॥ १ ॥

**चौ०** 
> चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥  
> हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥२॥

भावार्थ: राक्षसोंके झुंड वैसे ही भाग चले जैसे जोरकी हवा चलनेपर बादलोंके समूह तितर-बितर हो जाते हैं। लङ्का नगरीमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया। बालक, स्त्रियाँ और रोगी [ असमर्थताके कारण ] रोने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> सब मिलि देहिं रावनहिं गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥  
> निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥ ३ ॥

भावार्थ: सब मिलकर रावणको गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्युको बुला लिया। रावणने जब अपनी सेनाका विचलित होना कानोंसे सुना, तब [ भागते हुए ] योद्धाओंको लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥  
> सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥४॥

भावार्थ: मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक दुधारी तलवारसे मारूँगा। मेरा सब कुछ खाया, भाँति-भाँतिके भोग किये और अब रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये!॥ ४ ॥

**चौ०** 
> उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥  
> सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा॥५॥

भावार्थ: रावणके उग्र ( कठोर ) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्जित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले। रणमें [ शत्रुके ] सम्मुख ( युद्ध करते हुए ) मरनेमें ही वीरकी शोभा है। [ यह सोचकर ] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया॥ ५ ॥

**दो०** 
> बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।  
> ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि॥४२॥

भावार्थ: बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघों और त्रिशूलोंसे मार-मारकर सब रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया॥ ४२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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