---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 41"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-41"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 41

**चौ०** 
> कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥  
> बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥१॥

भावार्थ: वे परकोटेके कँगूरोंपर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरुके शिखरोंपर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, [ जिनकी ] ध्वनि सुनकर योद्धाओंके मनमें [ लड़नेका ] चाव होता है॥ १ ॥

**चौ०** 
> बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥  
> देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा॥२॥

भावार्थ: अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, [ जिन्हें ] सुनकर कायरोंके हृदयमें दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान् योद्धा वानर और भालुओंके ठट्ट ( समूह ) देखे॥ २॥

**चौ०** 
> धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥  
> कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥३॥

भावार्थ: [ देखा कि ] वे रीछ-वानर दौड़ते हैं; औघट ( ऊँची-नीची, विकट ) घाटियोंको कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ोंको फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतोंसे ओंठ काटते और खूब डपटते हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥  
> निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥४॥

भावार्थ: उधर रावणकी और इधर श्रीरामजीकी दोहाई बोली जा रही है। ‘जय’ ‘जय’ ‘जय’ की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी। राक्षस पहाड़ोंके ढेर-के-ढेर शिखरोंको फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर चलाते हैं॥ ४॥

**छं०** 
> धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।  
> झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥  
> अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।  
> कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥

भावार्थ: प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतोंके टुकड़े ले-लेकर किलेपर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसोंके पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चञ्चल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्तीसे उछलकर किलेपर चढ़-चढ़कर गये और जहाँ-तहाँ महलोंमें घुसकर श्रीरामजीका यश गाने लगे।

**दो०** 
> एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।  
> ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥४१॥

भावार्थ: फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वे वानर भाग चले। ऊपर आप और नीचे [ राक्षस ] योद्धा—इस प्रकार वे [ किलेपरसे ] धरतीपर आ गिरते हैं॥ ४१ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-40  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-42

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
