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title: "लंकाकाण्ड दोहा 40"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 40

**चौ०** 
> लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी॥  
> देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई॥१॥

भावार्थ: लङ्कामें बड़ा भारी कोलाहल ( कोहराम ) मच गया। अत्यन्त अहङ्कारी रावणने उसे सुनकर कहा—वानरोंकी ढिठाई तो देखो ! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलायी॥ १ ॥

**चौ०** 
> आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे॥  
> अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा॥२॥

भावार्थ: बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विधाताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्खने अट्टहास किया ( वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा )॥ २॥

**चौ०** 
> सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥  
> उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥३॥

भावार्थ: [ और बोला— ] हे वीरो ! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है [ मानो आकाशको थाम लेगा ]॥ ३॥

**चौ०** 
> चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥  
> तोमर मुद्गर परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरिखंडा॥४॥

भावार्थ: आज्ञा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिंदिपाल, साँगी ( बरछी ), तोमर, मुद्गर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले॥ ४॥

**चौ०** 
> जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥  
> चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥५॥

भावार्थ: जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंका समूह देखकर उसपर टूट पड़ते हैं, [ पत्थरोंपर लगनेसे ] चोंच टूटनेका दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े॥ ५॥

**दो०** 
> नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।  
> कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥४०॥

भावार्थ: अनेकों प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किये करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गये॥ ४०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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