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title: "लंकाकाण्ड दोहा 4"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 4

श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वतपर निवास, रावणकी व्याकुलता · रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद

**चौ०** 
> बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥  
> चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई॥१॥

भावार्थ: नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया। देखनेपर वह कृपानिधान श्रीरामजीके मनको [ बहुत ही ] अच्छा लगा। सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता। योद्धा वानरोंके समुदाय गरज रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई॥  
> देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा॥२॥

भावार्थ: कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्धके तटपर चढ़कर समुद्रका विस्तार देखने लगे। करुणाकन्द ( करुणाके मूल ) प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचरोंके समूह प्रकट हो गये ( जलके ऊपर निकल आये )॥ २ ॥

**चौ०** 
> मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥  
> अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥३॥

भावार्थ: बहुत तरहके मगर, नाक ( घड़ियाल ), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजनके बहुत बड़े विशाल शरीर थे। कुछ ऐसे भी जन्तु थे जो उनको भी खा जायँ। किसी-किसीके डरसे तो वे भी डर रहे थे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥  
> तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥४॥

भावार्थ: वे सब [ वैर-विरोध भूलकर ] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते। सबके मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता। वे सब भगवान्‌का रूप देखकर [ आनन्द और प्रेममें ] मग्न हो गये॥ ४॥

**चौ०** 
> चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥५॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर सेना चली। वानर-सेनाकी विपुलता ( अत्यधिक संख्या ) को कौन कह सकता है?॥ ५॥

**दो०** 
> सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।  
> अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥४॥

भावार्थ: सेतुबन्धपर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे और दूसरे [ कितने ही ] जलचर जीवोंपर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं॥ ४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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