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title: "लंकाकाण्ड दोहा 34b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 34b

**चौ०** 
> मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥  
> असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥१॥

भावार्थ: मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [ तेरी ] लङ्काको पकड़कर समुद्रमें डुबा दूँ॥ १ ॥

**चौ०** 
> गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥  
> मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥२॥

भावार्थ: तेरी लङ्का गूलरके फलके समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [ अज्ञानवश ] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी? पर उदार ( कृपालु ) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आज्ञा नहीं दी॥ २ ॥

**चौ०** 
> जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥  
> बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥३॥

भावार्थ: अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [ और बोला— ] अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियोंसे मिलकर लबार हो गया है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥  
> समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥४॥

भावार्थ: [ अंगदने कहा— ] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर ( स्मरण करके ) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके ( दृढ़ताके साथ ) पैर रोप दिया॥ ४ ॥

**चौ०** 
> जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥  
> सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥५॥

भावार्थ: [ और कहा— ] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायँगे, मैं सीताजीको हार गया। रावणने कहा—हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो॥ ५ ॥

**चौ०** 
> इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥  
> झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥६॥

भावार्थ: इन्द्रजीत ( मेघनाद ) आदि अनेकों बलवान्‌ योद्धा जहाँ-तहाँसे हर्षित होकर उठे। वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं॥ ६ ॥

**चौ०** 
> पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥  
> पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥७॥

भावार्थ: [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] वे देवताओंके शत्रु ( राक्षस ) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! अङ्गदका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी ( विषयी ) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते॥ ७ ॥

**दो०** 
> कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।  
> झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥३४ (क)॥

भावार्थ: करोड़ों वीर योद्धा जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्षित होकर उठे। वे बार-बार झपटते हैं, पर वानरका चरण नहीं उठता, तब लज्जाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं॥ ३४ ( क ) ॥

**दो०** 
> भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।  
> कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥३४ (ख)॥

भावार्थ: जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर ( अंगद )-का चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु ( रावण )-का मद दूर हो गया!॥ ३४ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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