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title: "लंकाकाण्ड दोहा 33b"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-33b"
lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 33b

**चौ०** 
> एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥  
> मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥१॥

भावार्थ: [ रावण फिर बोला— ] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरोंको पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों ( राम-लक्ष्मण ) को जीते-जी पकड़ लो॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥  
> मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥२॥

भावार्थ: [ रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर ] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले—तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज! अरे कुलनाशक! गला काटकर ( आत्महत्या करके ) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती!॥ २ ॥

**चौ०** 
> रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥  
> सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥३॥

भावार्थ: अरे स्त्रीके चोर! अरे कुमार्गपर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी! तू सन्निपातमें क्या दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू कालके वश हो गया है!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥  
> रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥४॥

भावार्थ: इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़तीं?॥ ४ ॥

**चौ०** 
> गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥५॥

भावार्थ: इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [ अकेले नहीं वरं ] सिरोंके साथ रणभूमिमें गिरेंगी॥ ५ ॥

**सो०** 
> सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।  
> बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़॥३३ (क)॥

भावार्थ: रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति, अरे जड! बीस आँखें होनेपर भी तू अन्धा है। तेरे जन्मको धिक्कार है॥ ३३ ( क ) ॥

**सो०** 
> तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर।  
> तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥३३ (ख)॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं। [ वे प्यासे ही रह जायँगे ] इस डरसे, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ॥ ३३ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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