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title: "लंकाकाण्ड दोहा 32b"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-32b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 32b

**चौ०** 
> जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥  
> हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥१॥

भावार्थ: जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [ शास्त्र ऐसा कहते हैं कि ] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है॥ १ ॥

**चौ०** 
> कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥  
> डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥२॥

भावार्थ: वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये ( शब्द किया ) और उन्होंने तमककर ( जोरसे ) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [ जिससे बैठे हुए ] सभासद् गिर पड़े और भयरूपी पवन ( भूत ) से ग्रस्त होकर भाग चले॥ २ ॥

**चौ०** 
> गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥  
> कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥३॥

भावार्थ: रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास फेंक दिये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥  
> की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥४॥

भावार्थ: मुकुटोंको आते देखकर वानर भागे। [ सोचने लगे ] विधाता! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा ( तारे टूटकर गिरने लगे )? अथवा क्या रावणने क्रोध करके चार वज्र चलाये हैं, जो बड़े धायेके साथ ( वेगसे ) आ रहे हैं?॥ ४ ॥

**चौ०** 
> कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥  
> ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥५॥

भावार्थ: प्रभुने [ उनसे ] हँसकर कहा—मनमें डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावणके मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगदके फेंके हुए आ रहे हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।  
> कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥३२ (क)॥

भावार्थ: पवनपुत्र श्रीहनुमान्‌जीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रभुके पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्यके समान था॥ ३२ ( क ) ॥

**दो०** 
> उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।  
> धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ॥३२ (ख)॥

भावार्थ: वहाँ ( सभामें ) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि—बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे॥ ३२ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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