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title: "लंकाकाण्ड दोहा 30"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-30"
lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 30

**चौ०** 
> अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥  
> दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥१॥

भावार्थ: अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूतकी तरह [ सन्धि करने ] नहीं आया हूँ। श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला॥  
> मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥२॥

भावार्थ: कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभुके [ उन ] वचनोंको मनमें समझकर ( याद करके ) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा॥  
> जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥३॥

भावार्थ: नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर ( चुरा ) लाया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥  
> जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥४॥

भावार्थ: तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक ( सुग्रीव ) का दूत ( सेवकका भी सेवक ) हूँ। यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि— ॥४॥

**दो०** 
> तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।  
> तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥३०॥

भावार्थ: तुझे जमीनपर पटककर, तेरी सेनाका संहारकर और तेरे गाँवको चौपट [ नष्ट-भ्रष्ट ] करके, अरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियोंसहित जानकीजीको ले जाऊँ॥ ३० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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