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title: "लंकाकाण्ड दोहा 29"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-29"
lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 29

**चौ०** 
> जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥  
> नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥१॥

भावार्थ: मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटोंपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी ( लेखको ) असत्य जानकर मैं हँसा॥ १ ॥

**चौ०** 
> सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥  
> आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें॥२॥

भावार्थ: उस बातको समझकर ( स्मरण करके ) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [ क्योंकि मैं समझता हूँ कि ] बूढ़े ब्रह्माने बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है!॥ २ ॥

**चौ०** 
> कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥  
> लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥३॥

भावार्थ: अंगदने कहा—अरे रावण! तेरे समान लज्जावान्‌ जगत्‌में कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही॥  
> सो भुजबल राखेहु उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली॥४॥

भावार्थ: सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओंके उस बलको तो तूने हृदयमें ही टाल ( छिपा ) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालिको जीता था॥ ४ ॥

**चौ०** 
> सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥  
> इंद्रजालि कहुँ कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥५॥

भावार्थ: अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है!॥ ५ ॥

**दो०** 
> जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।  
> ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥२९॥

भावार्थ: अरे मन्दबुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आगमें जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते॥ २९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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