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title: "लंकाकाण्ड दोहा 22b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 22b

**चौ०** 
> सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥  
> तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥१॥

भावार्थ: शिव, ब्रह्मा [ आदि ] देवता और मुनियोंके समुदाय जिनके चरणोंकी सेवा [ करना ] चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुलको डुबा दिया ? अरे ऐसी बुद्धि होनेपर भी तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता ?॥१॥

**चौ०** 
> सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी॥  
> खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ॥२॥

भावार्थ: वानर ( अंगद ) की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर ( तिरछी करके ) बोला—अरे दुष्ट! मैं तेरे सब कठोर वचन इसीलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्मको जानता हूँ ( उन्हींकी रक्षा कर रहा हूँ )॥२॥

**चौ०** 
> कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥  
> देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥३॥

भावार्थ: अंगदने कहा—तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। [ वह यह कि ] तुमने परायी स्त्रीकी चोरी की है! और दूतकी रक्षाकी बात तो अपनी आँखोंसे देख ली। ऐसे धर्मके व्रतको धारण ( पालन ) करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते!॥३॥

**चौ०** 
> कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी॥  
> धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी॥४॥

भावार्थ: नाक-कानसे रहित बहिनको देखकर तुमने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दिया था! तुम्हारी धर्मशीलता जग-जाहिर है। मैं भी बड़ा भाग्यवान्‌ हूँ, जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया !॥४॥

**दो०** 
> जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।  
> लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु॥२२ (क)॥

भावार्थ: [ रावणने कहा— ] अरे जड जन्तु वानर! व्यर्थ बक-बक न कर; अरे मूर्ख! मेरी भुजाएँ तो देख। ये सब लोकपालोंके विशाल बलरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेके लिये राहु हैं॥२२ (क)॥

**दो०** 
> पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।  
> सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास॥२२ (ख)॥

भावार्थ: फिर [ तूने सुना ही होगा कि ] आकाशरूपी तालाबमें मेरी भुजाओंरूपी कमलोंपर बसकर शिवजीसहित कैलास हंसके समान शोभाको प्राप्त हुआ था!॥२२ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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