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title: "लंकाकाण्ड दोहा 21"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 21

**चौ०** 
> रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी॥  
> कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई॥१॥

भावार्थ: [ रावणने कहा— ] अरे बंदरके बच्चे! सँभालकर बोल! मूर्ख! मुझ देवताओंके शत्रुको तूने जाना नहीं? अरे भाई! अपना और अपने बापका नाम तो बता। किस नातेसे मित्रता मानता है?॥ १ ॥

**चौ०** 
> अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा॥  
> अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥२॥

भावार्थ: [ अंगदने कहा— ] मेरा नाम अंगद है, मैं बालिका पुत्र हूँ। उनसे कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? अंगदका वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया [ और बोला— ] हाँ, मैं जान गया ( मुझे याद आ गया ), बालि नामका एक बंदर था॥ २ ॥

**चौ०** 
> अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक॥  
> गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु॥३॥

भावार्थ: अरे अंगद! तू ही बालिका लड़का है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुलरूपी बाँसके लिये अग्निरूप ही पैदा हुआ! गर्भमें ही क्यों न नष्ट हो गया? तू व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने ही मुँहसे तपस्वियोंका दूत कहलाया!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई॥  
> दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई॥४॥

भावार्थ: अब बालिकी कुशल तो बता, वह [ आजकल ] कहाँ है? तब अंगदने हँसकर कहा—दस ( कुछ ) दिन बीतनेपर [ स्वयं ही ] बालिके पास जाकर, अपने मित्रको हृदयसे लगाकर, उसीसे कुशल पूछ लेना॥ ४ ॥

**चौ०** 
> राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई॥  
> सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें॥५॥

भावार्थ: श्रीरामजीसे विरोध करनेपर जैसी कुशल होती है, वह सब तुमको वे सुनावेंगे। हे मूर्ख! सुन, भेद उसीके मनमें पड़ सकता है, ( भेदनीति उसीपर अपना प्रभाव डाल सकती है ) जिसके हृदयमें श्रीरघुवीर न हों॥५॥

**दो०** 
> हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।  
> अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस॥२१॥

भावार्थ: सच है, मैं तो कुलका नाश करनेवाला हूँ और हे रावण! तुम कुलके रक्षक हो। अंधे-बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, तुम्हारे तो बीस नेत्र और बीस कान हैं!॥२१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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