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title: "लंकाकाण्ड दोहा 20"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 20

**चौ०** 
> कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥  
> मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥१॥

भावार्थ: रावणने कहा—अरे बंदर! तू कौन है? [ अंगदने कहा— ] हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुवीरका दूत हूँ। मेरे पितासे और तुमसे मित्रता थी। इसलिये हे भाई! मैं तुम्हारी भलाईके लिये ही आया हूँ॥ १ ॥

**चौ०** 
> उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती॥  
> बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा॥२॥

भावार्थ: तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषिके तुम पौत्र हो। शिवजीकी और ब्रह्माजीकी तुमने बहुत प्रकारसे पूजा की है। उनसे वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं। लोकपालों और सब राजाओंको तुमने जीत लिया है॥ २ ॥

**चौ०** 
> नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा॥  
> अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा॥३॥

भावार्थ: राजमदसे या मोहवश तुम जगज्जननी सीताजीको हर लाये हो। अब तुम मेरे शुभ वचन ( मेरी हितभरी सलाह ) सुनो! [ उसके अनुसार चलनेसे ] प्रभु श्रीरामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी॥  
> सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें॥४॥

भावार्थ: दाँतोंमें तिनका दबाओ, गलेमें कुल्हाड़ी डालो और कुटुम्बियोंसहित अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर, आदरपूर्वक जानकीजीको आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो— ॥ ४ ॥

**दो०** 
> प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।  
> आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि॥२०॥

भावार्थ: और ‘हे शरणागतके पालन करनेवाले रघुवंशशिरोमणि श्रीरामजी! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।’ [ इस प्रकार आर्त प्रार्थना करो। ] आर्त पुकार सुनते ही प्रभु तुमको निर्भय कर देंगे॥ २० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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