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title: "लंकाकाण्ड दोहा 16b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 16b

**चौ०** 
> बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना॥  
> नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥१॥

भावार्थ: पत्नीके वचन कानोंसे सुनकर रावण खूब हँसा [ और बोला— ] अहो! मोह ( अज्ञान ) की महिमा बड़ी बलवान्‌ है! स्त्रीका स्वभाव सब सत्य ही कहते हैं कि उसके हृदयमें आठ अवगुण सदा रहते हैं— ॥१॥

**चौ०** 
> साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया॥  
> रिपु कर रूप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा॥२॥

भावार्थ: साहस, झूठ, चञ्चलता, माया ( छल ), भय ( डरपोकपन ), अविवेक ( मूर्खता ), अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रुका समग्र ( विराट्‌ ) रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया॥२॥

**चौ०** 
> सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें॥  
> जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई॥३॥

भावार्थ: हे प्रिये! वह सब ( यह चराचर विश्व तो ) स्वभावसे ही मेरे वशमें है। तेरी कृपासे मुझे यह अब समझ पड़ा। हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया। तू इस प्रकार ( इसी बहाने ) मेरी प्रभुताका बखान कर रही है॥३॥

**चौ०** 
> तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि॥  
> मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ॥४॥

भावार्थ: हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ ( रहस्यभरी ) हैं, समझनेपर सुख देनेवाली और सुननेसे भय छुड़ानेवाली हैं। मन्दोदरीने मनमें ऐसा निश्चय कर लिया कि पतिको कालवश मतिभ्रम हो गया है॥४॥

**दो०** 
> एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।  
> सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध॥१६(क)॥

भावार्थ: इस प्रकार [ अज्ञानवश ] बहुत-से विनोद करते हुए रावणको सबेरा हो गया। तब स्वभावसे ही निडर और घमण्डमें अंधा लंकापति सभामें गया॥१६ (क)॥

**सो०** 
> फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।  
> मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥१६(ख)॥

भावार्थ: यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्माके समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्खके हृदयमें चेत ( ज्ञान ) नहीं होता॥१६ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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