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title: "लंकाकाण्ड दोहा 15b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 15b

**चौ०** 
> पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥  
> भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥१॥

भावार्थ: पाताल [ जिन विश्वरूप भगवान्‌का ] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य ( बीचके सब ) लोकोंका विश्राम ( स्थिति ) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गोंपर है। भयङ्कर काल जिनका भृकुटिसंचालन ( भौंहोंका चलना ) है। सूर्य नेत्र है, बादलोंका समूह बाल है॥१॥

**चौ०** 
> जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा॥  
> श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी॥२॥

भावार्थ: अश्विनीकुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष ( पलक मारना और खोलना ) हैं। दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं। वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है॥२॥

**चौ०** 
> अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥  
> आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥३॥

भावार्थ: लोभ जिनका अधर ( होठ ) है, यमराज भयानक दाँत है। माया हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है, वरुण जीभ है। उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा ( क्रिया ) है॥३॥

**चौ०** 
> रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥  
> उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥४॥

भावार्थ: अठारह प्रकारकी असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसोंका जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचेकी इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना ( ऊहापोह ) क्या की जाय ?॥४॥

**दो०** 
> अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।  
> मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥१५(क)॥

भावार्थ: शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन हैं और महान्‌ ( विष्णु ) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचररूप भगवान्‌ श्रीरामजीने मनुष्यरूपमें निवास किया है॥१५ ( क )॥

**दो०** 
> अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।  
> प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ॥१५(ख)॥

भावार्थ: हे प्राणपति! सुनिये, ऐसा विचारकर प्रभुसे वैर छोड़कर श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय॥१५ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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