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title: "लंकाकाण्ड दोहा 11b"
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lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 11b

**चौ०** 
> इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥  
> सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥ १ ॥

भावार्थ: यहाँ श्रीरघुवीर सुबेल पर्वतपर सेनाकी बड़ी भीड़ ( बड़े समूह ) के साथ उतरे। पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर—॥ १ ॥

**चौ०** 
> तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥  
> ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहि आसन आसीन कृपाला॥ २ ॥

भावार्थ: वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये। उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे॥ २ ॥

**चौ०** 
> प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥  
> दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥ ३ ॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [ रखा ] है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥  
> प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥ ४ ॥

भावार्थ: परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं॥ ४॥

**दो०** 
> एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।  
> धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥ ११ (क) ॥

भावार्थ: इस प्रकार कृपा, रूप ( सौन्दर्य ) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं॥ ११ ( क )॥

**दो०** 
> पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक।  
> कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥ ११ (ख) ॥

भावार्थ: पूर्व दिशाकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामजीने चन्द्रमाको उदय हुआ देखा। तब वे सबसे कहने लगे—चन्द्रमाको तो देखो। कैसा सिंहके समान निडर है!॥ ११ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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