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title: "लंकाकाण्ड दोहा 119b"
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lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 119b

**चौ०** 
> अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥  
> मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥१॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमानपर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन-ही-मन विप्रचरणोंमें सिर नवाकर उत्तर दिशाकी ओर विमान चलाया॥१॥

**चौ०** 
> चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥  
> सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥२॥

भावार्थ: विमानके चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्रीरघुवीरकी जय कह रहे हैं। विमानमें एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उसपर सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये॥२॥

**चौ०** 
> राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥  
> रुचिर बिमान चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥३॥

भावार्थ: पत्नीसहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरुके शिखरपर बिजलीसहित श्याम मेघ हो। सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रतासे चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलोंकी वर्षा की॥३॥

**चौ०** 
> परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥  
> सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥४॥

भावार्थ: अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी। समुद्र, तालाब और नदियोंका जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं॥४॥

**चौ०** 
> कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥  
> हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥५॥

भावार्थ: श्रीरघुवीरने कहा—हे सीते! रणभूमि देखो। लक्ष्मणने यहाँ इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको मारा था। हनुमान्‌ और अंगदके मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमिमें पड़े हैं॥५॥

**चौ०** 
> कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥६॥

भावार्थ: देवताओं और मुनियोंको दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये॥६॥

**दो०** 
> इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम।  
> सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥११९(क)॥

भावार्थ: मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की। तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजीने सीताजीसहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया॥११९(क)॥

**दो०** 
> जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।  
> सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥११९(ख)॥

भावार्थ: वनमें जहाँ-जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजीने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखलाये और सबके नाम बतलाये॥११९(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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