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title: "लंकाकाण्ड दोहा 117b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 117b

विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओंका उन्हें पहनना

**चौ०** 
> सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥  
> बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनते ही विभीषणजीने हर्षित होकर कृपाके धाम श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये। सभी वानर-भालू हर्षित हो गये और प्रभुके चरण पकड़कर उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे॥१॥

**चौ०** 
> बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥  
> लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥२॥

भावार्थ: फिर विभीषणजी महलको गये और उन्होंने मणियोंके समूहों (रत्नों) से और वस्त्रोंसे विमानको भर लिया। फिर उस पुष्पकविमानको लाकर प्रभुके सामने रखा। तब कृपासागर श्रीरामजीने हँसकर कहा— ॥२॥

**चौ०** 
> चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन॥  
> नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही॥३॥

भावार्थ: हे सखा विभीषण! सुनो, विमानपर चढ़कर, आकाशमें जाकर वस्त्रों और गहनोंको बरसा दो। तब (आज्ञा सुनते) ही विभीषणजीने आकाशमें जाकर सब मणियों और वस्त्रोंको बरसा दिया॥३॥

**चौ०** 
> जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥  
> हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥४॥

भावार्थ: जिसके मनको जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है। मणियोंको मुँहमें लेकर वानर फिर उन्हें खानेकी चीज न समझकर उगल देते हैं। यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपाके धाम श्रीरामजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित हँसने लगे॥४॥

**दो०** 
> मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।  
> कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥११७(क)॥

भावार्थ: जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति-नेति कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं॥११७(क)॥

**दो०** 
> उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।  
> राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥११७(ख)॥

भावार्थ: [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! अनेकों प्रकारके योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करनेपर भी श्रीरामचन्द्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होनेपर करते हैं॥११७(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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