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title: "लंकाकाण्ड दोहा 116d"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 116d

**चौ०** 
> करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥  
> नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥१॥

भावार्थ: जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीसे बोले—हे शार्ङ्गधनुषके धारण करनेवाले प्रभो! मेरी विनती सुनिये— ॥१॥

**चौ०** 
> सकुल सदल प्रभु रावन मार्यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार्यो॥  
> दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥२॥

भावार्थ: आपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की॥२॥

**चौ०** 
> अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥  
> देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥३॥

भावार्थ: अब हे प्रभु! इस दासके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्तिका निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको दीजिये॥३॥

**चौ०** 
> सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥  
> सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥४॥

भावार्थ: हे नाथ! मुझे सब प्रकारसे अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरीको पधारिये। विभीषणजीके कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके दोनों विशाल नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥४॥

**दो०** 
> तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।  
> भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥११६ (क)॥

भावार्थ: [श्रीरामजीने कहा—] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है। पर भरतकी दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्पके समान बीत रहा है॥११६(क)॥

**दो०** 
> तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।  
> देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥११६ (ख)॥

भावार्थ: तपस्वीके वेषमें कृश (दुबले) शरीरसे निरन्तर मेरा नाम जप कर रहे हैं। हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी-से-जल्दी उन्हें देख सकूँ। मैं तुमसे निहोरा (अनुरोध) करता हूँ॥११६(ख)॥

**दो०** 
> बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।  
> सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥११६ (ग)॥

भावार्थ: यदि अवधि बीत जानेपर जाता हूँ तो भाईको जीता न पाऊँगा। छोटे भाई भरतजीकी प्रीतिका स्मरण करके प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है॥११६(ग)॥

**दो०** 
> करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।  
> पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥११६ (घ)॥

भावार्थ: [श्रीरामजीने फिर कहा—] हे विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना, मनमें मेरा निरन्तर स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उस धामको पा जाओगे जहाँ सब संत जाते हैं॥११६(घ)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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