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title: "लंकाकाण्ड दोहा 114b"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-114b"
lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 114b

**चौ०** 
> सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे॥  
> मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥१॥

भावार्थ: हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरोंने मार डाला है, पृथ्वीपर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हितके लिये अपने प्राण त्याग दिये। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो॥१॥

**चौ०** 
> सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥  
> प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥२॥

भावार्थ: [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, प्रभुके ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकीको मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्रको बड़ाई दी है॥२॥

**चौ०** 
> सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥  
> सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥३॥

भावार्थ: इन्द्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आये। अमृतकी वर्षा दोनों ही दलोंपर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं॥३॥

**चौ०** 
> रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥  
> सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥४॥

भावार्थ: क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव-बन्धन छूट गये। किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान्‌की लीलाके परिकर) थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजीकी इच्छासे जीवित हो गये॥४॥

**चौ०** 
> राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥  
> खल मल धाम कामरत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥५॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके समान दीनोंका हित करनेवाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसोंको मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर और कामी रावणने भी वह गति पायी जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते॥५॥

**दो०** 
> सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।  
> देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान॥११४ (क)॥

भावार्थ: फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानोंपर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर जानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास आये— ॥११४(क)॥

**दो०** 
> परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।  
> पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥११४ (ख)॥

भावार्थ: और परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्‌गद वाणीसे त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे— ॥११४(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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