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title: "लंकाकाण्ड दोहा 112"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 112

**चौ०** 
> तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥  
> अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥१॥

भावार्थ: उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्र ( श्रीरामजी ) को देखकर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया॥१॥

**चौ०** 
> तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥  
> सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥२॥

भावार्थ: [ श्रीरामजीने कहा— ] हे तात! यह सब आपके पुण्योंका प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रोंमें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥  
> ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीने पहलेके ( जीवित कालके ) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [ कैवल्य ] मोक्ष नहीं पाया॥३॥

**चौ०** 
> सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥  
> बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥४॥

भावार्थ: [ मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त ] सगुणस्वरूपकी उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभुको [ इष्टबुद्धिसे ] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये॥४॥

**दो०** 
> अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।  
> सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस॥११२॥

भावार्थ: छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इन्द्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे— ॥११२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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