---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 111"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-111"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 111

**छं०** 
> जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥  
> भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥१॥

भावार्थ: हे नित्य सुखधाम और [ दुःखोंको हरनेवाले ] हरि! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव ( जन्म-मरण ) रूपी हाथीको विदीर्ण करनेके लिये सिंहके समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणोंके समुद्र और परम चतुर हैं॥१॥

**छं०** 
> तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥  
> जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥२॥

भावार्थ: आपके शरीरकी अनेकों कामदेवोंके समान, परन्तु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्पको गरुड़की तरह क्रोध करके पकड़ लिया॥२॥

**छं०** 
> जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥  
> अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥३॥

भावार्थ: हे प्रभो! आप सेवकोंको आनन्द देनेवाले, शोक और भयका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वीका भार उतारनेवाला और ज्ञानका समूह है॥३॥

**छं०** 
> अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥  
> रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥४॥

भावार्थ: [ किन्तु अवतार लेनेपर भी ] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक ( अद्वितीय ) और अनादि हैं। हे करुणाकी खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्षके साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके आभूषण! हे दूषण राक्षसको मारनेवाले तथा समस्त दोषोंको हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [ लंकाका ] राजा बना दिया॥४॥

**छं०** 
> गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥  
> भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥५॥

भावार्थ: हे गुण और ज्ञानके भण्डार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारोंसे रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डोंका प्रताप और बल प्रचण्ड है। दुष्टसमूहके नाश करनेमें आप परम निपुण हैं॥५॥

**छं०** 
> बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥  
> भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥६॥

भावार्थ: हे बिना ही कारण दीनोंपर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभाके धाम! मैं श्रीजानकीजीसहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागरसे तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनोंसे परे हैं और मनसे उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषोंको हरनेवाले हैं॥६॥

**छं०** 
> सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जलजारुन लोचन भूपबरं॥  
> सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥७॥

भावार्थ: आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं। [ लाल ] कमलके समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओंमें श्रेष्ठ, सुखके मन्दिर, सुन्दर, श्री ( लक्ष्मीजी ) के वल्लभ तथा मद ( अहङ्कार ), काम और झूठी ममताके नाश करनेवाले हैं॥७॥

**छं०** 
> अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो॥  
> इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥८॥

भावार्थ: आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [ कोई ] दन्तकथा ( कोरी कल्पना ) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं॥८॥

**छं०** 
> कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥  
> धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥९॥

भावार्थ: हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [ और ] हे हरे! हमारे [ अमर ] जीवन और देव ( दिव्य ) शरीरको धिक्कार है, जो हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें ( सांसारिक विषयोंमें ) भूले पड़े हैं॥९॥

**छं०** 
> अब दीनदयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥  
> जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥१०॥

भावार्थ: हे दीनदयालु! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ॥१०॥

**छं०** 
> खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥  
> नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं॥११॥

भावार्थ: आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वतीद्वारा सेवित हैं। हे राजाओंके महाराज! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [ अनन्य ] प्रेम हो॥११॥

**दो०** 
> बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।  
> सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥१११॥

भावार्थ: इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीरसे विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे॥१११॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-110  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-112

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
