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title: "लंकाकाण्ड दोहा 109b"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 109b

देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा

**चौ०** 
> प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥  
> लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥१॥

भावार्थ: प्रभुके वचनोंको सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्मसे पवित्र श्रीसीताजी बोलीं—हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मके नेगी ( धर्माचरणमें सहायक ) बनो और तुरंत आग तैयार करो॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥  
> लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥२॥

भावार्थ: श्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका ] जल भर आया। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते॥ २॥

**चौ०** 
> देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥  
> पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥३॥

भावार्थ: फिर श्रीरामजीका रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये। अग्निको खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजीके हृदयमें हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥ ३॥

**चौ०** 
> जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥  
> तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥४॥

भावार्थ: [ सीताजीने लीलासे कहा— ] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरी गति ( अन्य किसीका आश्रय ) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मनकी गति जानते हैं, [ मेरे भी मनकी गति जानकर ] मेरे लिये चन्दनके समान शीतल हो जायँ॥ ४॥

**छं०** 
> श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।  
> जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥  
> प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।  
> प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥१॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामजीका स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजीके द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजीकी अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चन्दनके समान शीतल हुई अग्निमें प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब ( सीताजीकी छायामूर्ति ) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्निमें जल गये। प्रभुके इन चरित्रोंको किसीने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े देखते हैं॥ १ ॥

**छं०** 
> धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।  
> जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥  
> सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।  
> नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥२॥

भावार्थ: तब अग्निने शरीर धारण करके वेदोंमें और जगत्‌में प्रसिद्ध वास्तविक श्री ( सीताजी ) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजीको वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागरने विष्णुभगवान्‌को लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके वाम भागमें विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो॥ २ ॥

**दो०** 
> बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान।  
> गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥१०९ (क)॥

भावार्थ: देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाशमें डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानोंपर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥ १०९ ( क )॥

**दो०** 
> जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।  
> देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥१०९ (ख)॥

भावार्थ: श्रीजानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गये और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय बोलने लगे॥ १०९ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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