---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 108"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-108"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 108

**चौ०** 
> अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥  
> तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥१॥

भावार्थ: हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमान्‌जीने जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥  
> मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥२॥

भावार्थ: सूर्यकुलभूषण श्रीरामजीने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [ और कहा— ] पवनपुत्र हनुमान्‌के साथ जाओ और जानकीको आदरके साथ ले आओ॥ २ ॥

**चौ०** 
> तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥  
> बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥३॥

भावार्थ: वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्नान कराया,॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥  
> ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥४॥

भावार्थ: बहुत प्रकारके गहने पहनाये और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथ चढ़ीं॥ ४॥

**चौ०** 
> बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥  
> देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥५॥

भावार्थ: चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले। सबके मनोंमें परम उल्लास ( उमंग ) है। रीछ-वानर सब दर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े॥ ५ ॥

**चौ०** 
> कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥  
> देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं॥६॥

भावार्थ: श्रीरघुवीरने कहा—हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माताकी तरह देखें। गोसाईं श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा॥ ६ ॥

**चौ०** 
> सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥  
> सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥७॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये। आकाशसे देवताओंने बहुत-से फूल बरसाये। सीताजी [ के असली स्वरूप ] को पहले अग्निमें रखा था। अब भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं॥ ७॥

**दो०** 
> तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।  
> सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥१०८॥

भावार्थ: इसी कारण करुणाके भण्डार श्रीरामजीने लीलासे कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं॥ १०८ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-107  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-109b

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
