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title: "लंकाकाण्ड दोहा 106"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 106

विभीषणका राज्याभिषेक · हनुमान्‌जीका सीताजीको कुशल सुनाना, सीताजीका आगमन और अग्नि-परीक्षा

**चौ०** 
> आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥  
> तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥१॥  
> सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥  
> पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥२॥

भावार्थ: सब क्रिया-कर्म करनेके बाद विभीषणने आकर पुनः सिर नवाया। तब कृपाके समुद्र श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको बुलाया। श्रीरघुनाथजीने कहा कि तुम, वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषणके साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजीके वचनोंके कारण मैं नगरमें नहीं आ सकता। पर अपने ही समान वानर और छोटे भाईको भेजता हूँ॥१-२॥

**चौ०** 
> तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना॥  
> सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी॥३॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलककी सारी व्यवस्था की। आदरके साथ विभीषणको सिंहासनपर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की॥३॥

**चौ०** 
> जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए॥  
> तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे॥४॥

भावार्थ: सभीने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाये। तदनन्तर विभीषणजीसहित सब प्रभुके पास आये। तब श्रीरघुवीरने वानरोंको बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया॥४॥

**छं०** 
> किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।  
> पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो॥  
> मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।  
> संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं॥

भावार्थ: भगवान्‌ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया। इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा। जो लोग मेरे सहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे, वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायँगे।

**दो०** 
> प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।  
> बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥१०६॥

भावार्थ: प्रभुके वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त नहीं होते। वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलोंको पकड़ते हैं॥१०६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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