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title: "लंकाकाण्ड दोहा 105"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 105

**चौ०** 
> मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥  
> अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी॥१॥

भावार्थ: मन्दोदरीके वचन कानोंसे सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी ( परमात्माके तत्त्वको जानने और कहनेवाले ) श्रेष्ठ मुनि थे॥ १ ॥

**चौ०** 
> भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥  
> रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥२॥

भावार्थ: वे सभी श्रीरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घरकी सब स्त्रियोंको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये॥ २ ॥

**चौ०** 
> बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥  
> लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥३॥

भावार्थ: उन्होंने भाईकी दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको आज्ञा दी [ कि जाकर विभीषणको धैर्य बँधाओ ]। लक्ष्मणजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया तब विभीषण प्रभुके पास लौट आये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥  
> कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥४॥

भावार्थ: प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा [ और कहा— ] सब शोक त्यागकर रावणकी अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर और हृदयमें देश और कालका विचार करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की॥ ४॥

**दो०** 
> मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।  
> भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥१०५॥

भावार्थ: मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे ( रावणको ) तिलाञ्जलि देकर मनमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन करती हुई महलको गयीं॥ १०५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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