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title: "लंकाकाण्ड दोहा 10"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 10

सुबेलपर श्रीरामजीकी झाँकी और चन्द्रोदयवर्णन

**चौ०** 
> यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा॥  
> सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई॥१॥

भावार्थ: हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्‌में दोनों ही प्रकारसे आपका सुयश होगा। रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा—अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी ?॥१॥

**चौ०** 
> अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥  
> सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा॥२॥

भावार्थ: अभीसे हृदयमें सन्देह ( भय ) हो रहा है ? हे पुत्र! तू तो बाँसकी जड़में घमोई हुआ ( तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ )। पिताकी अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया॥२॥

**चौ०** 
> हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥  
> संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥३॥

भावार्थ: हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती ( आपपर कैसे असर नहीं करती ), जैसे मृत्युके वश हुए [ रोगी ] को दवा नहीं लगती। सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा॥  
> बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन॥४॥

भावार्थ: लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था। वहाँ नाच-गानका अखाड़ा जमता था। रावण उस महलमें जाकर बैठ गया। किन्नर उसके गुणसमूहोंको गाने लगे॥ ४॥

**चौ०** 
> बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना॥५॥

भावार्थ: ताल ( करताल ), पखावज ( मृदंग ) और वीणा बज रहे हैं। नृत्यमें प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।  
> परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास॥१०॥

भावार्थ: वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है। यद्यपि [ श्रीरामजी-सरीखा ] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है॥ १० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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