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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 6"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-6"
lang: "hi"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 6

**चौ०** 
> नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥  
> मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥१॥

भावार्थ: [ सुग्रीवने कहा— ] हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं। हम दोनोंमें ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती। हे प्रभो! मय दानवका एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। एक बार वह हमारे गाँवमें आया॥ १ ॥

**चौ०** 
> अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहइ न पारा॥  
> धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा॥२॥

भावार्थ: उसने आधी रातको नगरके फाटकपर आकर पुकारा ( ललकारा )। बालि शत्रुके बल ( ललकार ) को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाईके सङ्ग लगा चला गया॥ २ ॥

**चौ०** 
> गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बाली मोहि कहा बुझाई॥  
> परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥३॥

भावार्थ: वह मायावी एक पर्वतकी गुफामें जा घुसा। तब बालिने मुझे समझाकर कहा—तुम एक पखवाड़े ( पंद्रह दिन ) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं उतने दिनोंमें न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥  
> बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥४॥

भावार्थ: हे खरारि! मैं वहाँ महीनेभरतक रहा। वहाँ ( उस गुफामेंसे ) रक्तकी बड़ी भारी धारा निकली। तब [ मैंने समझा कि ] उसने बालिको मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ ( गुफाके द्वारपर ) एक शिला लगाकर भाग आया॥ ४ ॥

**चौ०** 
> मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं॥  
> बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥५॥

भावार्थ: मन्त्रियोंने नगरको बिना स्वामी ( राजा ) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे [ राजसिंहासनपर ] देखकर उसने जीमें भेद बढ़ाया ( बहुत ही विरोध माना )। [ उसने समझा कि यह राज्यके लोभसे ही गुफाके द्वारपर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा ]॥ ५ ॥

**चौ०** 
> रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी॥  
> ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥६॥

भावार्थ: उसने मुझे शत्रुके समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्रीको भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भयसे समस्त लोकोंमें बेहाल होकर फिरता रहा॥ ६ ॥

**चौ०** 
> इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥  
> सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥७॥

भावार्थ: वह शापके कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मनमें भयभीत रहता हूँ। सेवकका दुःख सुनकर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरघुनाथजीकी दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं॥ ७ ॥

**दो०** 
> सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।  
> ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥६॥

भावार्थ: [ उन्होंने कहा— ] हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाणसे बालिको मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्रकी शरणमें जानेपर भी उसके प्राण न बचेंगे॥ ६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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